Tag: Over Emotional People

  • ये Overrrrrrrrrr लोग कहाँ जाएँ?

    दुनिया ने तो महसूस करना बहुत कम कर दिया है…

    आजकल एक शब्द बहुत आसानी से इस्तेमाल कर लिया जाता है – “ओवर”।

    कभी-कभी सोचती हूँ…क्या सच में किसी की बहुत परवाह करना, किसी के लिए हर वक़्त मौजूद रहना गलत है? क्या किसी के दुख में बेचैन हो जाना, उसकी ख़ामोशी में छिपी तकलीफ़ पढ़ लेना, उसकी ज़रूरत से पहले उसकी ज़रूरत समझ लेना गलत है?

    अगर है, तो शायद ऐसे लोगों में कोई न कोई कमी तो ज़रूर है क्योंकि कुछ लोग ऐसे ही होते हैं जो रिश्तों को सिर्फ़ निभाते नहीं, जीते हैं। “कैसे हो?” सिर्फ़ पूछते नहीं, सचमुच जानना चाहते हैं। “अपना ख़्याल रखना” कहकर आगे नहीं बढ़ जाते, बल्कि तब तक सोचते रहते हैं जब तक यकीन न हो जाए कि सामने वाला सच में ठीक है।

    लेकिन अजीब बात यह है कि आजकल ऐसे लोगों को प्यार कम और “ओवर” का टैग ज़्यादा मिलता है और ज़्यादातर उन्हें यही सुनने को मिलता है…

    “तुम कितना ओवर केयर करते हो।”

    “तुम कितना ओवर एक्सप्रेसिव हो।”

    “तुम कितना ओवर इमोशनल हो।”

    “तुम कितना ज़्यादा सोचते हो।”

    “तुम कितना अटैच हो जाते हो।”

    “इतना ओवर भी कोई करता है क्या?”

    “तुम कितना ओवर हो…”

    और ये सब सुनते-सुनते, ये तथाकथित “ओवर” लोग धीरे-धीरे अपने ही स्वभाव के कटघरे में खड़े हो जाते हैं। वे अपने आप से पूछने लगते हैं…

    “क्या मैं गलत हूँ?”

    “क्या किसी के लिए दिल से सोचना गलत है?”

    “क्या किसी की चिंता करना गलत है?”

    “क्या किसी के दुख में उसके साथ खड़े रहना गलत है?”

    “क्या किसी को यह एहसास दिलाना कि मैं तुम्हारे साथ हूँ गलत है?”

    “क्या मुझमें ही कोई कमी है?”
    “क्या मेरा स्वभाव गलत है?”
    “क्या मुझे इतना महसूस नहीं करना चाहिए?”

    लेकिन शायद असली सवाल यह नहीं है कि ये लोग गलत हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि आज के समय में आखिर ऐसा क्या हो गया है कि लोग सच्ची भावनाओं से डरने लगे हैं?

    कितनी अजीब बात है…आज के समय में लोगों को अकेलेपन से शिकायत है, लेकिन जब कोई सच में उनके लिए, उनके साथ खड़ा होता है, उनकी चिंता करता है, उनका हाल पूछता है, उनकी ख़ामोशी पढ़ लेता है, तब वही बात उन्हें डराने लगती है।

    हम कहते हैं कि दुनिया में अपनापन कम हो गया है, लेकिन जब कोई अपना बनने की कोशिश करता है, तो हम घबरा जाते हैं।

    हम कहते हैं कि लोग स्वार्थी हो गए हैं, लेकिन जब कोई निस्वार्थ होकर हमारा साथ देता है, तो हम उसे “ओवर” कह देते हैं या कहीं न कहीं ऐसा सोचते हैं कि कहीं इसका कोई स्वार्थ तो नहीं।

    हम कहते हैं कि हमें कोई समझने वाला नहीं मिलता, लेकिन जब कोई हमें बिना कहे समझ लेता है, तो हमें लगता है कि वह हमारे बहुत करीब आ रहा है।

    आज का समय… सबसे ज़्यादा अकेला

    हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हर व्यक्ति दिनभर सैकड़ों लोगों से जुड़ा रहता है। मोबाइल में हजारों कॉन्टेक्ट्स हैं, सोशल मीडिया पर हज़ारों दोस्त हैं, लेकिन दिल की बात सुनने और समझने वाला कोई एक भी नहीं।

    हम घंटों स्क्रीन के साथ रह सकते हैं, लेकिन किसी इंसान की भावनाओं के साथ कुछ मिनट बैठना हमें भारी लगने लगा है।

    हमारी उंगलियाँ हर समय किसी स्क्रीन को छूती रहती हैं, लेकिन अब न तो हमारे दिल किसी दूसरे के दिल को छू पाते हैं, न हमारे हाथ किसी का हाथ थामकर उसे अकेले न होने का एहसास दे पा रहे हैं।

    हमने शब्द खो दिये हैं, हमनें धैर्य खो दिया है, हमनें अपनापन खो दिया है, और शायद सबसे ज़्यादा हमने भावनाओं को स्वीकार करने की क्षमता और इच्छा खो दी है।

    आज की सच्चाई यह है कि हम कनेक्टेड तो बहुत हैं… लेकिन जुड़े हुए नहीं।

    आखिर लोग प्यार से डरने क्यों लगे हैं?

    इस बात को समझना थोड़ा कठिन लगता है। किसी का प्रेम आपको घुटन क्यों देने लगता है? किसी की परवाह आपको बोझ क्यों लगने लगती है? किसी का हमेशा साथ होना आपको असहज क्यों कर देता है?

    क्या इसलिए कि वह व्यक्ति गलत है? या इसलिए कि शायद हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ लोगों ने भावनाओं को महसूस करने से पहले उनका विश्लेषण करना शुरू कर दिया है और भावनात्मक निकटता से दूरी बनाना शुरू कर दिया है।

    धीरे-धीरे हमने स्वतंत्रता और दूरी को एक ही समझ लिया है। हमें लगता है कि कोई हमारी परवाह कर रहा है तो शायद वह हमारी आज़ादी छीन लेगा। कोई बार-बार पूछ रहा है कि हम ठीक हैं या नहीं, तो शायद वह हम पर अधिकार जमाना चाहता है। कोई बहुत प्यार कर रहा है, तो शायद वह भावनात्मक रूप से हम पर निर्भर हो जाएगा।

    किसी की केयर अब प्यार से ज़्यादा “प्रेशर” लगने लगी है। किसी का लगाव अब अपनापन कम और “अटैचमेंट इश्यू” ज़्यादा लगने लगा है। किसी की मौजूदगी अब सुकून कम और “स्पेस में दखल” ज़्यादा लगने लगी है।

    और सबसे दुखद बात यह है कि लोग प्यार से नहीं डरते…वे प्यार के साथ आने वाली ज़िम्मेदारी से डरते हैं। उन्हें डर लगता है कि कहीं उन्हें भी उतना ही महसूस न करना पड़े। उन्हें डर लगता है कि कहीं वे भी किसी के इतने करीब न आ जाएँ कि खोने का भय महसूस होने लगे। उन्हें डर लगता है कि कहीं किसी का महत्व उनके जीवन में बहुत ज़्यादा न बढ़ जाए। इसलिए वे दूरी बनाए रखते हैं, सुरक्षित रहते हैं, संभलकर चलते हैं। इसी डर की वजह से कई बार उस इंसान को ही “ओवर” कहकर अपने से दूर कर देते हैं जो बस दिल से जी रहा होता है, दिल से उनके साथ होता है।

    लेकिन क्या हर गहरा भावनात्मक जुड़ाव निर्भरता होता है?

    क्या हर चिंता नियंत्रण होती है? क्या हर लगाव बंधन होता है? शायद नहीं।

    कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दुनिया से अलग होते हैं। वे रिश्तों को सिर्फ निभाते नहीं, महसूस करते हैं। वे सिर्फ सुनते नहीं, समझते हैं। वे सिर्फ साथ नहीं रहते, मौजूद रहते हैं। किसी की परेशानी उन्हें परेशान कर देती है। किसी की ख़ामोशी से उन्हें चिंता होती है। किसी को तक़लीफ में देखकर वे अपने हिस्से की नींद भी खो देते हैं।

    वे ऐसा इसलिए नहीं करते कि उन्हें बदले में कुछ चाहिए। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनका दिल ऐसा है। शायद यही बात बहुत लोग नहीं समझ पाते कि उनकी संवेदनशीलता उनकी भाषा है, उनकी परवाह उनका व्यक्तित्व है, उनका प्यार उनका स्वभाव है। वो ऐसे ही बने हैं, उन्होंने ऐसे ही दिल के साथ जन्म लिया है। उन्हें अपने से ज़्यादा दूसरों के लिए कुछ भी करने में ही ख़ुशी मिलती है।

    क्या सच में “ओवर” लोग गलत हैं?

    शायद नहीं।

    हाँ, किसी भी रिश्ते में सीमाएँ ज़रूरी हैं। किसी की अपनी जगह और स्वतंत्रता का सम्मान भी ज़रूरी है। हर व्यक्ति को अपना स्पेस चाहिए, लेकिन स्पेस का मतलब यह नहीं कि भावनाएँ मर जाएँ। स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि अपनापन ख़त्म हो जाए। मजबूती का मतलब यह नहीं कि किसी की ज़रूरत ही महसूस न हो। और आधुनिकता का मतलब यह बिल्कुल नहीं कि हम महसूस करना छोड़ दें।

    और किसी के दिल को सिर्फ इसलिए गलत ठहरा देना कि वह बहुत महसूस करता है, शायद न्याय नहीं है।

    शायद वे लोग “ओवर” नहीं हैं…संभव है कि बाकी दुनिया ने महसूस करना थोड़ा कम कर दिया है।

    और ये भी संभव है कि वे गलत समय में पैदा हुए वे लोग हैं जो अब भी रिश्तों को निभाना चाहते हैं। जो अब भी किसी के लिए रुकना चाहते हैं। जो अब भी किसी की ख़ामोशी सुनना चाहते हैं। जो अब भी मानते हैं कि इंसान को इंसान की ही ज़रूरत है। हर इंसान को किसी टेक्नोलॉजी की नहीं बल्कि एक ऐसे दिल की ज़रूरत है, जो बिना किसी स्वार्थ के पूछ सके…“तुम ठीक हो न?

    और दुख की बात यह है कि आज दुनिया ऐसे लोगों को समझने के बजाय उनसे बचने लगी है।

    संवेदनशील लोग अक्सर बदले में उतना कुछ नहीं माँगते। वे सिर्फ़ समझे जाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि सामने वाला कहे कि, “मैं समझता हूँ, तुम ऐसे ही हो। मुझे पता है तुम्हारी परवाह सच्ची है, तुम मुझे बाँधना नहीं चाहते, बस मेरे लिए मौजूद रहना चाहते हो।” उनके प्यार, उनके अपनेपन को दिल से स्वीकृति मिले।

    लेकिन अक्सर उन्हें सुनने को मिलता है, “तुम बहुत ज़्यादा हो, तुम बहुत ओवर करते हो, तुम्हारी वजह से मैं ओरिजिनल नहीं रह पा रहा, मैं बंधा महसूस करता हूँ।” और यही शब्द उन्हें भीतर तक तोड़ देते हैं।

    क्योंकि वे किसी पर बोझ बनना नहीं चाहते बल्कि वे सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि जिन लोगों को वे अपना मानते हैं, वे खुश रहें, सुरक्षित रहें, अकेला न महसूस करें।

    लेकिन जब उनकी भावनाओं को बोझ समझ लिया जाता है, तब वे धीरे-धीरे चुप होने लगते हैं और ख़ुद को बदलने लगते हैं। वे अपने मेसेजेस टाइप करके मिटाने लगते हैं। वे अपनी चिंता छुपाने लगते हैं। अपने व्यक्तित्व के विरुद्ध वे पूछना छोड़ देते हैं कि “तुम ठीक हो न?” वे अपनी भावनाओं पर पहरा बिठा देते हैं। अपनी मौजूदगी कम करने लगते हैं। लेकिन सच यह है कि उनके भीतर का प्रेम कभी कम नहीं होता। बस वह व्यक्त करना बंद कर देते हैं और ऐसा होना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।

    शायद इस दुनिया को कम भावनाओं की नहीं, बल्कि भावनाओं को स्वीकार करने की ज़रूरत है। क्योंकि सच तो यह है कि जिन लोगों को हम “ओवर इमोशनल” कहते हैं, वही लोग अक्सर इस दुनिया में इंसानियत की थोड़ी गर्माहट बचाए हुए हैं।

    शायद एक दिन जिन लोगों के लिए वो “ओवर” हैं उनको एहसास होगा कि दुनिया में सबसे दुर्लभ चीज़ किसी का प्यार पाना नहीं था…सबसे दुर्लभ चीज़ थी किसी ऐसे निस्वार्थ दिल का मिल पाना।

    और ऐसे दिलों को बदलने की नहीं, संभालकर रखने की ज़रूरत होती है।

    अगर आपको कभी यह कहा गया है कि आप बहुत “ओवर” हैं “बहुत ज़्यादा” हैं…

    तो शायद आपको ख़ुद को बदलने की नहीं, ख़ुद को समझने की ज़रूरत है। हो सकता है आपका दिल दूसरों से थोड़ा ज़्यादा महसूस करता हो। हो सकता है आप रिश्तों को थोड़ा ज़्यादा महत्व देते हों। हो सकता है आप लोगों को छोड़ने के बजाय संभालने में विश्वास रखते हों। और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

    क्योंकि आज की दुनिया में सबसे कठिन है एक ऐसा दिल, एक ऐसा इंसान मिलना…जो सचमुच आपकी परवाह करता हो। जो आपकी ख़ामोशी सुन सके, जो आपके टूटने पर आपके साथ बैठ सके। जो बिना समय देखे आपके लिए मौजूद रह सके। जो बिना शर्त, बिना हिसाब और बिना थके आपके लिए धड़कता रहे।

    और अगर आप ऐसे इंसान हैं, तो ख़ुद को कभी “बहुत ज़्यादा” मत समझिए क्योंकि जिस दिन दुनिया से आप जैसे लोग ख़त्म हो जाएँगे…उस दिन रिश्ते तो रह जाएँगे, लेकिन उनमें धड़कन नहीं बचेगी।

    हो सकता है आप इस दुनिया के लिए बहुत ज़्यादा हों… लेकिन किसी एक दिल के लिए, आप ठीक उतने ही होंगे जितने की उसे हमेशा से ज़रूरत थी।