“काश… एक बार कह दिया होता।”

हम अक्सर समय नहीं, अवसर खो देते हैं…

“कुछ लोग एक रोज़ जो बिछड़ जाते है

वो हजारों के आने से मिलते नहीं

उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम

वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते …”

तब एहसास होता है कि जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु नहीं, बल्कि उसका अनिश्चित होना है।

हमें नहीं पता होता…

कौन-सी मुलाक़ात…आख़िरी मुलाक़ात होगी।

कौन-सी बातचीत…आख़िरी बार हो रही होगी।

किसे देखकर हम…आख़िरी बार मुस्कुरा रहे होंगे

या किसे हम आख़िरी बार अलविदा कह रहे होंगे।

“जीवन क्षणभंगुर है” शायद यही जीवन का सबसे गहरा सत्य है। जो जीवन किसी क्षण भी नष्ट हो सकता है, हम अक्सर उसी जीवन को सबसे ज़्यादा हल्के में लेते हैं। ये साँसे जो हमारे शरीर में हैं, वो किस क्षण नहीं होंगी किसी को नहीं पता। कोई नहीं जानता कि अगला पल किसके लिए क्या लेकर आएगा। फिर भी हम शिकवों, गलतफ़हमियों, झिझक, अहंकार और सबसे बढ़कर इस भ्रम में जीते रहते हैं कि अभी तो पूरी ज़िन्दगी पड़ी है।

अपनी भावनाएँ व्यक्त करने, प्यार जताने, माफ़ करने और माफ़ी माँगने के लिए हम हमेशा सही समय का इंतज़ार करते रहते हैं। जबकि हमें ये पता ही नहीं कि कब वो पूरी ज़िन्दगी किसी एक पल में सिमट कर ख़त्म हो जायेगी।

हमारा अधिकांश समय तो इस चिंता में ही बीतता है कि दूसरे क्या सोचेंगे, हमें जज किया जाएगा, या हमारी भावनाओं को स्वीकृति मिलेगी भी या नहीं। लेकिन क्या होगा अगर हम यही सब सोचकर कुछ न कह पायें, और फिर कुछ कह पाने का मौका हमसे हमेशा के लिए छिन जाये?

क्या होगा अगर जिस व्यक्ति को हम अपने मन का कहना चाहते थे, बताना चाहते थे कि हम उसके लिए कैसा महसूस करते हैं, वह अचानक से हमेशा के लिए चला जाए? क्या अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार होना हमारा कर्तव्य नहीं? या फिर हमने यह मान लिया है कि भावनाएँ व्यक्त करना हमें कमज़ोर बना देता है?

जो लोग हमारी ज़िन्दगी में बेहद अहमियत रखते हैं और जब वो हमारे पास, हमारे साथ होते हैं, तब हम उनके प्रति अपनी भावनाओं की गहराई को व्यक्त क्यों नहीं करते? हम बहुत देर होने तक इंतज़ार क्यों करते हैं? हम अपने आप को ये बताने से क्यों रोकते रहते हैं कि वे हमारे लिए कितने मायने रखते हैं। और फिर एक दिन अचानक, जब वो हम सब को, इस दुनिया को छोड़ बहुत दूर चले जाते हैं, तब हमें यह दर्दनाक एहसास होता है कि अब हम उन्हें कभी भी, कुछ भी अपने दिल का नहीं बता पाएंगे कि हम वास्तव में उनके लिए क्या महसूस करते हैं।

हम अक्सर अपनी प्रशंसा, अपना प्यार और अपना आभार उस दिन के लिए बचाकर रखते हैं, जब वह व्यक्ति हमारे बीच नहीं रहता। हम अपने धन्यवाद और अपने प्यार को केवल अपनी यादों की खामोशी में, उस व्यक्ति के चले जाने के बाद क्यों फुसफुसाते हैं? तब हम उसकी अच्छाइयाँ, उसका स्नेह, उसके संघर्ष, उसके साथ बिताए पल और हमारे जीवन पर उसके प्रभाव की बातें सबसे करते हैं।

लेकिन जब वह व्यक्ति हमारे साथ होता है, तब हम वही बातें उससे कह नहीं पाते या शायद हमें ऐसा करना ज़रूरी नहीं लगता। हो सकता है वो व्यक्ति भी आपसे बहुत कुछ कहना चाहता हो, आपके साथ समय बिताना चाहता हो, उसके जीवन में आपका महत्व भी बताना चाहता हो, लेकिन…

हम सब दौड़ते रहते हैं….

ज़िम्मेदारियों के पीछे…सफलता के पीछे…भविष्य के पीछे।

और इस भागदौड़ में, कभी-कभी सबसे क़ीमती चीज़ पीछे छूट जाती है….भावनाएँ।

वह व्यक्ति जो हमारे लिए सबसे ज़्यादा मायने रखता था, वह हमारे शब्द अब कभी नहीं सुनेगा, हमारे आँसू कभी नहीं देखेगा और हमारी कृतज्ञता को कभी महसूस नहीं करेगा।

अब न तो उसका साथ रहेगा, न उसकी आवाज़, न उससे बात करने का अवसर। अंत में शेष रह जाएँगे तो सिर्फ़ पछतावे…

‘काश! मैंने अपने मन की बातें उससे खुलकर कहीं होतीं।’

‘काश! मैंने उसके साथ थोड़ा और समय बिताया होता।’

‘काश! मैंने भी कभी उसके मन में क्या है, ये जानने की कोशिश की होती।’

‘काश मैंने उसका सही से आभार व्यक्त किया होता।’

‘काश मैं उसकी ज़रूरतों के वक़्त उसके पास मौजूद होता।’

‘काश! मैंने उसे बताया होता कि मुझे उसकी कितनी ज़रूरत है।’

‘काश मैंने उसे कहा होता कि मैं उससे कितना प्यार करता हूँ।’

काश! काश! काश!…. और ऐसे न जाने कितने काश! और इस हर एक काश! का भार, बहुत अधिक होता है। और जब तक ये समझ आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। अपनी भावनाओं को व्यक्त करने, अपना प्यार और प्रशंसा का इज़हार करने का अवसर बहुत दूर जा चुका होता है।

जीवन जितना अनमोल है, उतना ही अनिश्चित, अप्रत्याशित भी। कभी-कभी अनुभव और जीवन की क्षण-भंगुरता, मन को बहुत बेचैन और आहत भी कर देती है। शायद इसी सत्य ने मुझे हमेशा अपने लोगों के प्रति ईमानदार रहना सिखाया है।मैंने हमेशा लोगों, रिश्तों और उनके साथ बिताए हर पल को बहुत महत्व दिया है। अपने मन की बात कहने और अपनों की बात सुनने की कोशिश की है। और यह भी चाहा है कि जिन लोगों से मेरा रिश्ता है, वे मेरे मन की बात मेरे जीते-जी सुन सकें। क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरे हिस्से में “काश” का बोझ ज़रूरत से ज़्यादा आए।

मैं जानती हूँ कि पूरी तरह ऐसा कभी संभव नहीं होता। कुछ अधूरे शब्द, कुछ छूटे हुए पल और कुछ अनकही भावनाएँ शायद हर जीवन का हिस्सा होती हैं। लेकिन अगर हम चाहें, तो उनका बोझ थोड़ा हल्का ज़रूर कर सकते हैं।

और हाँ… जिन लोगों की ज़िंदगी में, मैं थोड़ी भी जगह रखती हूँ, उनसे बस एक छोटी-सी विनती है। मेरे लिए आपके मन में जो भी भाव हों – अच्छे या बुरे, प्यार हो या शिकायत, गुस्सा हो या आभार, उन्हें मेरे जीते-जी शब्द दे दीजिए। क्योंकि किसी के चले जाने के बाद कही गई बातें, उस व्यक्ति तक कभी पहुँच नहीं पातीं।

और आप सबसे भी बस यही कहना चाहती हूँ, बहुत देर होने का इंतज़ार मत कीजिए। जो लोग आपके जीवन में मायने रखते हैं, उन्हें आज ही अपने दिल की बात कह दीजिए। ज़रूरत हो तो माफ़ी माँग लीजिए, किसी को माफ़ करना हो तो कर दीजिए, अपना प्यार, अपना आभार और अपनी परवाह व्यक्त कर दीजिए। उन्हें महसूस होने दीजिए कि उनका होना आपके जीवन में कितना महत्वपूर्ण है। उनका हाथ थामिए, उन्हें गले लगाइए और साथ बिताए हर पल को पूरी तरह जी लीजिए। क्योंकि हम नहीं जानते कि कब आज का यह पल, कल सिर्फ़ एक याद बन जाएगा।

इतना भर कीजिए कि आपके हिस्से के “काश…” थोड़े कम हो जाएँ। जो लोग आपको प्रिय हैं, उन्हें यह महसूस होने दीजिए कि वे आपके लिए कितने मायने रखते हैं। अपने मन में जो भी हो…प्यार, सम्मान, आभार, शिकायत या क्षमा, उसे आज ही शब्द दे दीजिए। अपने हर एक रिश्ते को महसूस कराएँ कि उन्हें देखा, सुना और प्यार किया जा रहा है।
क्योंकि जब कोई अपना चला जाता है, तो हम सिर्फ़ एक इंसान को नहीं खोते, बल्कि उसके सामने अपने मन की बात कहने का अवसर भी हमेशा के लिए खो देते हैं।
और फिर पूरी ज़िंदगी हमारे भीतर एक ही आवाज़ गूँजती रहती है “काश… एक बार कह दिया होता।”

जब अगली बार किसी अपने की याद आए…उसे सिर्फ़ याद मत कीजिए, उसे बता दीजिए कि वह आपके लिए कितना मायने रखता है।

क्योंकि किसी अपने को खोने का दुख समय के साथ शायद थोड़ा हल्का पड़ भी जाए, लेकिन उसके सामने अपने मन की बात न कह पाने का पछतावा अक्सर आख़िरी साँस तक साथ चलता है।
शायद यही वे “काश…” हैं, जो कभी पूरी तरह ख़ामोश नहीं होते।

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