क्या आपके बच्चे का सपना वास्तव में उसका अपना है?

जब भी किसी परीक्षा का परिणाम आने वाला होता है, हर घर में उम्मीदों, डर, ख़ुशी और बेचैनी का एक अजीब सा माहौल हो जाता है। हमारे घर में भी कुछ ऐसा ही माहौल था जब मेरी बेटी का 12th बोर्ड का रिज़ल्ट आने वाला था। रिज़ल्ट आया… कुछ विषयों में उसके अच्छे नंबर थे, लेकिन मैथ्स और फिज़िक्स में कम नंबर आने की वजह से उसकी ओवरआल परसेंटेज उम्मीद से कम रह गई। 12वीं का रिज़ल्ट सामने था।
सबकी नज़र नंबरों पर थी…
लेकिन मेरी नज़र बार-बार अपनी बेटी के चेहरे पर जा रही थी क्योंकि उन नंबरों से कहीं ज़्यादा मुझे उसके पिछले दो साल दिखाई दे रहे थे – उसकी चुप्पियाँ, उसके आँसू, उसका डर… और एक माँ होने के नाते मेरी अपनी गलतियाँ।

कक्षा 11 की शुरुआत में उसके अंदर इंजीनियर बनने का सपना था, और उसे लगता था कि वो ये सपना साकार भी करेगी। उसने बहुत मन से इंजीनियरिंग की कोचिंग में एडमिशन लिया। नई किताबें, नए नोट्स, बड़े सपने… सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था। मुझे भी यही लगता था कि मेरी बेटी बहुत मेहनती है, पढ़ाई में भी इतनी अच्छी है, वो तो कर ही लेगी। लेकिन डेढ़ महीने बाद ही मुझे उसके अंदर बहुत सारे बदलाव दिखने लगे। वह बिल्कुल भी पहले जैसी नहीं थी, वो हमेशा चुप रहने लगी। कुछ भी कहो या पूछो तो बस रो पड़ती। कमरे में अकेली बैठी रहती। मैं जब भी पूछने की कोशिश करती, “क्या हुआ है बेटा?” वो हर बार एक ही जवाब देती “कुछ भी नहीं मम्मी।”

एक माँ अपने बच्चे की आँखों का दर्द पढ़ लेती है, चाहे वह कुछ कहे या नहीं। मुझे उसकी तकलीफ़ समझ आ रही थी। और उसकी परेशानी मुझे भी बहुत परेशान कर रही थी। एक दिन मैंने उसे बहुत प्यार से अपने पास बैठाया, मैं उसके साथ हूँ ये विश्वास दिलाया, बहुत देर की कोशिश के बाद उसने अपनी चुप्पी तोड़ी और वो फूट-फूट कर रोने लगी। मैंने उसे रोने दिया। थोड़ी देर बाद उसने बोला, “मम्मी, मुझसे नहीं हो पा रहा, मैं कितनी भी कोशिश करूँ लेकिन फिज़िक्स मुझे समझ ही नहीं आती। मैं कोचिंग नहीं करना चाहती, लेकिन आपके इतने पैसे लग चुके हैं, मैं उनको भी ऐसे बर्बाद नहीं कर सकती।”

उस पल मुझे एहसास हुआ कि मेरी बेटी पढ़ाई से नहीं, अपने डर और अपराध बोध से लड़ रही थी। उसे इंजीनियरिंग की कोचिंग कठिन लग रही थी, लेकिन उससे भी ज़्यादा उसे यह परेशान कर रहा था कि कहीं वह हमारी उम्मीदों पर खरी न उतरी तो। हमेशा ही वो पढ़ाई में अव्वल रही थी। उसने अपने मन की तकलीफ़ से ज़्यादा, हमारे पैसों और उम्मीदों का बोझ अपने दिल पर रख रखा था।

उसकी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही थी। मैंने उसी समय उससे कहा, “बेटा, पैसे तुम्हारी जिंदगी से बढ़कर नहीं। तुमसे नहीं हो पा रहा तो ज़बरदस्ती अपने को और परेशान मत करो, तुम अब कोचिंग नहीं जाओगी” और मैंने उसकी कोचिंग छुड़वा दी।

आज सोचती हूँ तो लगता है, शायद वही पहला सही फैसला था जो मैंने समय रहते लिया।

लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई, मेरे दिमाग़ में कहीं न कहीं था की वो फिज़िक्स से डर रही है। मैंने उससे कहा कि तुम्हारे स्कूल में कॉउंसलर्स हैं, उनसे करियर गाइडेंस ले लो। अगर तुम्हें लगे कि तुम्हें स्ट्रीम बदलनी है, तो बदल लो। अभी भी देर नहीं हुई है। मुझे उम्मीद थी कि उसे वहां से दिशा मिलेगी, लेकिन उसे कोई स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं मिला। और यहाँ भी मैं ख़ुद को भी दोष देती हूँ। शायद मुझे उसी समय उसकी प्रोफेशनल करियर काउंसलिंग करवानी चाहिए थी। मैं समझ रही थी फिर भी शायद मैं उतनी जागरूक नहीं थी। मैंने भी वही गलती की जो बहुत सारे माता-पिता अनजाने में कर बैठते हैं, बच्चों की योग्यता, उनके सामर्थ्य और उनकी मानसिक स्थिति को समझने की बजाय “अच्छे कैरियर” की दौड़ में अपने बच्चे को दौड़ाना शुरू कर देते हैं।

11th में मेरी बेटी ने एक विषय साइकोलॉजी भी लिया था। धीरे-धीरे वही उसका पसंदीदा विषय बन गया। वो हमेशा बहुत रूचि से साइकोलॉजी पढ़ती। घंटों साइकोलॉजी की बातें करती। लोगों के व्यवहार, भावनाओं और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में पढ़ते हुए उसकी आँखों में एक अलग चमक आ जाती थी। 12th में उसने मुझसे कहा, “मम्मी, मैं साइकोलॉजी में ही अपना करियर बनाना चाहती हूँ।”

लेकिन उसके मन में अभी भी डर था कि कहीं इंजीनियरिंग की तरह उसका यह फ़ैसला भी गलत न हो? कहीं बाद में उसे पछताना न पड़े? वो इस बार पूरी तरह से आश्वस्त होना चाहती थी। सच कहूँ तो मैं भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी क्योंकि हम दोनों ही साइकोलॉजी में क्या भविष्य हो सकता है, सही से नहीं जानते थे। मुझे बस इतना पता था कि वह इंजीनियरिंग करने में कभी ख़ुश नहीं रहेगी।

देर से ही सही लेकिन 12th में मैंने उसकी करियर काउंसलिंग करवाई। उसका साइकोमेट्रिक टेस्ट हुआ। जब रिपोर्ट आई तो उससे साफ हो चुका था कि साइकोलॉजी ही उसके लिए सबसे उपयुक्त करियर ऑप्शन है। उस दिन मैंने अपनी बेटी के चेहरे पर एक अलग सुकून देखा। जैसे उसके अंदर चल रही लड़ाई खत्म हो गई हो। उसे यह विश्वास मिल गया हो कि वह गलत नहीं सोच रही। उसकी रूचि ही उसकी ताकत है। अब उसके मन में किसी भी तरह का कोई संदेह नहीं था, उसे अपने भविष्य के लिए सही दिशा मिल गयी थी।

और फिर जब 12th का परिणाम आया, तब साइकोलॉजी में उसके पूरे 100 नंबर थे।

उस एक “100” ने मुझे यह नहीं बताया कि मेरी बेटी कितनी होशियार है। उसने मुझे यह सिखाया कि सही जगह पर खड़ा बच्चा ही अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाता है। समस्या उसकी क्षमता में नहीं थी…
समस्या बस यह थी कि हम उसे उसकी जगह से दूर खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे।

हर बच्चा हर चीज़ के लिए नहीं बना होता। कुछ बच्चे नंबरों में अच्छे होते हैं, कुछ शब्दों में, कुछ कला में, कुछ लोगों की भावनाएँ समझने में। लेकिन हम अक्सर सफलता को सिर्फ कुछ चुनिंदा करियर तक सीमित कर देते हैं। डॉक्टर, इंजीनियर, सरकारी नौकरी… जैसे इनके बाहर ज़िन्दगी ही नहीं है।

फिज़िक्स और मैथ्स के नंबर देखकर मुझे अपनी बेटी पर नहीं, खुद पर गुस्सा आया। बार-बार मन में यही आया… “काश! मैं थोड़ी और जागरूक होती। काश! मैंने समय रहते उसकी सही काउंसलिंग करवाई होती। काश! मैंने उसकी मानसिक क्षमता और रूचि को पहले समझा होता।” अगर मैं सही समय पर सही एक्शन लेती तो शायद उसको वह दो साल इतने डर, दबाव और मानसिक संघर्ष में नहीं बिताने पड़ते।

आज अपने अनुभव से मैं पूरे विश्वास के साथ कहना चाहती हूँ कि कक्षा 10 के बाद हर बच्चे की करियर काउंसलिंग बहुत ज़रूरी है। सिर्फ इसलिए नहीं कि उसे सही करियर चुनना है, बल्कि इसलिए कि वह ख़ुद को समझ सके। हर बच्चे की रुचि, क्षमता और मानसिक बनावट अलग होती है, लेकिन हम अक्सर उन्हें एक ही पैमाने से मापने लगते हैं। शायद इसी वजह से कई बच्चे अपने सपनों से ज़्यादा हमारे सपनों का बोझ उठाने लगते हैं।

एक बच्चा जब बार-बार यह महसूस करता है कि उसकी मेहनत के बावजूद वह बहुत अच्छा नहीं कर पा रहा है, तो वह अंदर से टूटने लगता है। वह ख़ुद को दूसरों से कम समझने लगता है। कई बार यही दबाव, बच्चों को मानसिक तनाव (mental stress), घबराहट (anxiety) और अवसाद (depression) का शिकार बना देता है| न वो किसी से कुछ कह पाते हैं और न किसी को कुछ समझा पाते हैं। जाने कितने डर उन्हें हमेशा डराते रहते हैं और ऐसे ही अनकहे डर से डरते – डरते कई बार बच्चे कुछ गलत क़दम उठा लेते हैं।

माता-पिता होने के नाते हम अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा चाहते हैं। लेकिन “सबसे अच्छा” हमेशा वही नहीं होता जो हम अच्छा मानते हैं या समाज अच्छा मानता है। सबसे अच्छा वह होता है जिसमें हमारा बच्चा खुश रहे, मानसिक रूप से स्वस्थ रहे, अपनी पहचान बना पाए, सुकून से सो पाये और हर सुबह बिना डर के उठ पाये।

हमें यह समझना होगा कि बच्चे हमारी अधूरी इच्छाएँ पूरी करने का माध्यम नहीं हैं। वे अपनी अलग पहचान लेकर इस दुनिया में आये हैं। उनके सपने हमसे अलग हो सकते हैं, उनकी मंज़िलें हमसे अलग हो सकती हैं और यह उनका अधिकार भी है।

अगर कोई बच्चा आर्ट्स, साइकोलॉजी, संगीत, डिज़ाइनिंग या लेखन चुनना चाहता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी क्षमता कम है। असल में किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी क्षमता तभी सामने आती है जब उसे अपनी रुचि के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। निसंदेह उसी क्षेत्र में वो अपना सर्वश्रेष्ठ दे पायेगा।

क्यों हम बच्चों को समझने की बजाय उन्हें बदलने की कोशिश करते हैं?

क्यों हम उनकी चुप्पियों को आलस समझ लेते हैं?

क्यों हम उनके डर को “बहाना” कह देते हैं?

क्यों हम यह भूल जाते हैं कि जिन कंधों पर हम उम्मीदों का इतना बोझ डाल रहे हैं, वे अभी बहुत नाजुक़ हैं?

बच्चों को महंगे स्कूलों या कोचिंग की ज़रूरत नहीं, उन्हें ज़रूरत है ऐसे घर की जहाँ वे बिना डरे अपने मन की हर बात कह सकें। जहाँ उनके ऊपर अपने माता-पिता की अपेक्षाओं का बोझ न हो।

और हर बच्चे को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है तो अपने माता – पिता के इस आश्वासन की… “कोई बात नहीं बेटा, हम तुम्हारे साथ हैं।”

क्योंकि अगर माता-पिता ही बच्चों को नहीं समझेंगे, उनका साथ नहीं देंगे तो फिर कौन देगा?

नंबर, करियर, सफलता सब ज़रूरी हैं लेकिन आपके बच्चे की ज़िन्दगी से ज़्यादा शायद कुछ भी ज़रूरी नहीं। नंबर आपके बच्चे की पहचान नहीं हो सकते। पेरेंट्स होने के नाते ये पूरी तरह से हमारी ज़िम्मेदारी है कि हर परिस्थिति में हम अपने बच्चे का साथ दें और उनका आत्मविश्वास टूटने न दें।

इसलिए अपने बच्चों को सिर्फ सफल नहीं, ख़ुश बनाइए। उन्हें सिर्फ जीतना ही नहीं, हारना भी सिखाइये। उन्हें सिर्फ आगे बढ़ना नहीं, ख़ुद को समझना भी सिखाइए। उनकी तुलना मत कीजिए, उनकी बातें सुनिए। उनके मन को समझिए, उनके डर को महसूस कीजिए।

क्योंकि हर बच्चा किसी न किसी चीज़ में अदभुत होता है… बस जरूरत है उसे पहचानने की, स्वीकार करने की और उसका हाथ थामकर उसके साथ चलने की। क्योंकि आखिर में बच्चों को शायद यह याद भी न रहे कि उनके नंबर कितने थे…
उन्हें हमेशा याद रहेगा कि जब वे सबसे ज़्यादा टूटे थे, सबसे ज़्यादा परेशान थे, तब उनके माता-पिता उनके साथ खड़े थे या नहीं।

और विश्वास मानिए…
किसी भी बच्चे की सबसे बड़ी सफलता अच्छे नंबर नहीं, बल्कि यह भरोसा होता है कि
“चाहे कुछ भी हो जाए…मेरे माता-पिता मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ेंगे।”

2 responses to “क्या आपके बच्चे का सपना वास्तव में उसका अपना है?”

  1. सौ प्रतिशत सही। बच्चा अगर अपने मन का सब्जेक्ट पढ़ेगा तो एक ना एक दिन उसको ज़िन्दगी में बड़ी या छोटी लेकिन कामयाबी ज़रूर मिलेगी। इसलिए माँ बाप को अपने बच्चों के मन को पढ़ना और उनको गाइड करना बहुत ज़रूरी होता है । और ये गाइडेंस केवल सब्जेक्ट्स सिलेक्शन तक ना सीमित होकर उनको जीवन की हर दिशा में देनी चाहिए।

Leave a Reply

Discover more from Tulika ki nazar se...zindagi ka safar

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading