वेदना…..

आहिस्ता चल जिंदगी, अभी कई कर्ज़ चुकाना बाकी है…..

एक और कविता के द्वारा अपनी भावनाओं को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूँ। इस कविता के माध्यम से मैंने मनुष्य के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाया है। मैं इस कविता की ज़्यादा भूमिका बाँधना नहीं चाहती, बस इतना बताना चाहती हूँ कि जब भी मैं इस कविता को पढ़ती हूँ तो गला भर आता है और आँखे नम होने लगती हैं। आशा है कि आपके दिल को भी यह पंक्तियाँ उतना ही छू पायेगीं।

~ मनुष्य की वेदना ~

जब हुआ उसका जन्म, आँख एक क्षण को खुली

उसने पाया हर तरफ ख़ुशनुमा माहौल था

बचपन आया, हँसता-खेलता रहा,
प्यार और दुलार उसको, सबका खूब मिलता रहा
दुनिया से अन्जान था वो, और कोई चिन्तन न था

फिर रखा यौवन की दहलीज़ पर उसने कदम
हर तरफ कठिनाइयों, कर्तव्यों का था सागर अथाह
वह खड़ा था बीच में, पार करना संयम से था

पार कर दहलीज़ को अब बुढ़ापा आ चुका था
प्यार से सींचा जिन्हे, करता रहा जिनके लिए
था उन्ही पर आश्रित, उनकी दया का पात्र था

फिर एक समय ऐसा भी आया, दम उसका घुटने लगा
मोह तब भी छोड़ न पाया, जाने का उसके मन न था
जब मौत लबों पर आ गयी, उसने बस इतना कहा
इससे पहले तू कभी, मानव इतना बेबस न था|

– तूलिका श्रीवास्तव “मनु”

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Author: तूलिका श्रीवास्तव "मनु"

जब कोई भी बात मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोर देती है तो मैं लिखने के लिए विवश हो जाती हूँ।

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