आज फिर से लिखने बैठ गई अपनी लेखनी से…….. इस लेखनी के ही बारे में। मैं जब भी बहुत खुश होती हूँ, दुखी होती हूँ, कुछ ऐसा होता है या ऐसा कुछ भी महसूस करती हूँ जो किसी से नहीं कह पाती तो अपने दिल की भावनाओं को इस लेखनी के माध्यम से कागज़ पर उतार देती हूँ। लेखनी के महत्व और ताकत के बारे में शायद ही किसी को बताने की ज़रूरत हो। आज हमारे पास जितना भी ज्ञान है, लेखनी की वजह से ही है। अगर किसी ने इसका प्रयोग नहीं किया होता, कुछ लिखा ही नहीं होता तो हमें किसी तरह का कोई ज्ञान नहीं होता। मेरी ज़िंदगी में तो इसका एक अलग ही महत्व है।
लेखनी (कलम)
हूँ कहाँ मैं तन्हा, तुम हो मेरी अपनी कितनी
निःसंकोच कह देती हूँ मैं, हृदय की हर व्यथा अपनी
चिन्तन नहीँ, मनन नहीँ, शब्दों की परिसीमा नहीँ
क्या कहूँ? क्या ना कहूँ? ऐसी कोई उलझन नहीँ
ना ही तुम नाराज़ होती, ना ही हो तुम झुँझलाती
कहती हूँ मैं बेझिझक, और बस तुम चलती जातीं
न होती तुम तो, न रहती मैं भी, मिट जाता अस्तित्व कहीं
पल-पल, घुट घुट कर मरती, पहचान कहीं मेरी खो जाती
जितनी प्यारी मित्र हो तुम, उतनी अच्छी श्रोता भी
धन्यवाद लेखनी तुम्हें हृदय से
तुम ही हो मेरी, एक सच्ची साथी
– तूलिका श्रीवास्तव “मनु”
कहते भी हैं ना की आपकी लेखनी का सम्बंध सीधे आपकी आत्मा से है। हर इंसान लिख सकता है…….और हम में से हर किसी को लिखना भी चाहिए…..कवि, लेखक, साहित्यकार, इतिहासकार आदि बनने के लिए नहीं…….अपने लिए लिखिए। एकान्त में एक कागज़ और लेखनी लेकर अपने दिल की हर बात को अपनी लेखनी के माध्यम से शब्दों का रूप दीजिये। आप जो महसूस करते हैं और किसी से नहीं कह पाते, अच्छी से अच्छी और बुरी से बुरी बात आप बिना किसी संकोच के अपनी लेखनी से कह पाएँगे। और आपको पता ही नहीं चलेगा की कब आपको भी एक सच्चा साथी मिल गया।
That’s beautiful
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Bahut sunder abhivyakti
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Wow! Such a lovely poem.
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Beautiful…. keep it up….Best of luck dear
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It’s beautifully written. You inspired me to write for myself :).
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Beautiful
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Beautiful..Dil ko chhu lene wali LAKHNI.. Thanks.
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