ज़िन्दगी…..

….एक छोटा सा, सरल सा शब्द और 
इसका अर्थ ….उतना ही उलझा और गहरा

“ज़िन्दगी”…. एक छोटा सा, सरल सा शब्द और इसका अर्थ …. उतना ही उलझा और गहरा, कि शायद ही कोई समझ पाये। हम सभी के जीवन में कभी न कभी या कहें बहुत बार ऐसा समय आता है जब हम अपने आप को किसी न किसी तरह की परेशानियों में घिरा पाते हैं। कभी अपने व्यक्तिगत संबंधों की वजह से, कभी स्वास्थ्य की वजह से और कभी अपनी आर्थिक स्थिति की वजह से हम इतने तन्हा और परेशान हो जाते हैं कि जाने-अनजाने मायूसी और निराशा को अपने गले लगा लेते हैं। हर वक़्त यही सोचते हैं कि हमें ही ऐसी ज़िन्दगी क्यों मिली? क्या वाकई में हम इस तरह की ज़िंदगी के अधिकारी थे? ज़िन्दगी जीने की कोई वजह समझ नहीं आती, कोई रास्ता नहीं सूझता, हर तरफ सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है। एक समय ऐसा भी आता है जब अपने अस्तित्व से भी हमें नफ़रत होने लगती है।

बहुत बार मेरे साथ भी ऐसा होता है जब मेरे मन-मस्तिष्क में भी अपनी ज़िन्दगी, अपने वजूद, अपने अधिकारों को लेकर हज़ारों प्रश्न उठ रहे होतें हैं और कभी न ख़त्म होने वाला अंतर्द्वन्द्व चल रहा होता है। मैं जब भी ऐसी मानसिक स्थिति से गुज़र रही होती हूँ तो अपनी लिखी कविता “ज़िन्दगी” को बार-बार पढ़ती हूँ। कविता की चंद पंक्तियों के द्वारा ज़िन्दगी के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने का प्रयास करती हूँ और ज़िन्दगी को पुनः एक चुनौती की तरह स्वीकार करती हूँ।

मुझे आशा नहीं विश्वास है कि इस कविता को पढ़कर आप भी अपने कठिन समय में, आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हुए, ज़िन्दगी को एक नया आयाम देने का प्रयास करेंगे।

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ज़िन्दगी

सागर है तो लहरें उठेंगी गिरेंगी, शांत भी होंगी वही
हवा है तो चलाएगी कितनी कश्तियाँ दिशा में अपनी
रुख हवा का जो बदलकर, ले आये किनारे अपनी कश्ती और खोने न देे साहिल कहीं, सफल है एक माँझी वही

तूफान कितने ही आयें, चले आँधिया कितनी ही
उड़ा दें कितने कणों को, दे गिरा कितने तरु ही
उठें हैं तो थमेंगें, चली हैं तो रुकेंगीं
मामूली एक अंधड़, चट्टान न हिला पाया कभी

ये घना अंधकार तुमको, भले डराए कितना ही
समय का है परिवर्तन, रात है ये कुछ क्षणों की अंधकार है तो यह न सोचो, रात काली सदा रहेगी
रात होती ही है इसलिए, दे सके हमको सुबह नयी

ज़िन्दगी है तो कभी बाँधेगी आस
निराश कभी तुझको करेगी
दृढ़ रखना विश्वास स्वयं पर, अस्तित्व खोने देना नहीं
सच एक छोटा सा इतना, इसके सिवा कुछ भी नहीं
जिन्दगी पर्याय है संघर्ष का
संघर्ष ही है ज़िन्दगी…… संघर्ष ही है ज़िन्दगी

– तूलिका श्रीवास्तव “मनु”

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Author: तूलिका श्रीवास्तव "मनु"

जब कोई भी बात मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोर देती है तो मैं लिखने के लिए विवश हो जाती हूँ।

24 thoughts on “ज़िन्दगी…..”

    1. Very beautifully written, I really appreciate your efforts to put the reality of life in the form of such a wonderful poem. Wish to see many more such write-ups from you :)). Momita

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  1. तूफान कितने ही आयें, चले आँधिया कितनी ही
    उड़ा दें कितने कणों को, दे गिरा कितने तरु ही
    उठें हैं तो थमेंगें, चली हैं तो रुकेंगीं
    मामूली एक अंधड़, चट्टान न हिला पाया कभी।
    ये घना अंधकार तुमको, भले डराए कितना ही
    समय का है परिवर्तन, रात है ये कुछ क्षणों की अंधकार है तो यह न सोचो, रात काली सदा रहेगी
    रात होती ही है इसलिए, दे सके हमको सुबह नयी

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  2. तूफान कितने ही आयें, चले आँधिया कितनी ही
    उड़ा दें कितने कणों को, दे गिरा कितने तरु ही
    उठें हैं तो थमेंगें, चली हैं तो रुकेंगीं
    मामूली एक अंधड़, चट्टान न हिला पाया कभी।
    ये घना अंधकार तुमको, भले डराए कितना ही
    समय का है परिवर्तन, रात है ये कुछ क्षणों की अंधकार है तो यह न सोचो, रात काली सदा रहेगी
    रात होती ही है इसलिए, दे सके हमको सुबह नय
    Antarman ko chho liya in panktiyon ne🤗

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  3. सुन्दर .. इतने साल में पहली बार हिंदी में एक ब्लॉग पढ़ा – और पहली बार मैं भी हिंदी में लिख रहा हूँ .. अच्छी शुरुआत है लिखते रहिये

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    1. धन्यवाद चंद्रशेखर सर, आप भी मेरे लेख पढ़ते रहियेगा और अपनी राय दीजियेगा।

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  4. अभिव्यक्ति तूलिका के माध्यम से शब्दों के रूप में ऐसे ही निरंतर व्यक्त होती रहे, अच्छी पहल!

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