जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी
उस रोज़ शब्दों को सलीके से नहीं रखूँगी,
कोई बात अधूरी नहीं छोड़ूँगी,
हर बात पूरी लिखूँगी।
जिन शब्दों को होंठों तक लाकर
हर बार लौटा दिया था मैंने,
उन शब्दों को आवाज़ देकर ख़ुलकर लिखूँगी
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

लिखूँगी उन ख़्वाहिशों को भी,
जिनकी बारी हमेशा सबके बाद आई,
और कई बार आते-आते भी नहीं आ पाई।
और जो ख़्वाहिशें कभी हक़ीक़त नहीं बन पाईं,
उस हर ख़्वाहिश को बेहिसाब लिखूँगी
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

लिखूँगी कैसे सबके हिस्से का वक़्त बचाते-बचाते
मेरे हिस्से की उम्र चुपचाप गुज़र गई
कैसे मैं अपनी ही ज़िंदगी में,
हमेशा दूसरे पायदान पर खड़ी रह गई।
ख़ुद को कभी सबसे पहले न रख पाने का,
अपना वो अफ़सोस भी लिखूँगी
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

लिखूँगी उन नाराज़गियों को भी,
रिश्तों को बचाने की ख़ातिर,
जिन्हें मुस्कुराकर निगल लिया था।
लिखूँगी कुछ चीखें भी,
जिन्हें दुनिया ने मेरी ख़ामोशी समझ लिया था।
उन ख़ामोश चीखों की
अनसुनी आवाज़ लिखूँगी
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

कुछ आँसू भी होंगे, जिन्हें रोक लिया था ये कहकर
अभी नहीं…अभी बहुत कुछ संभालना है।
मगर उस रोज़ नहीं संभालूँगी कुछ भी,
अपने बिखरे अल्फ़ाज़ लिखूँगी।
हो सकता है मेरे सच से कुछ दिल दुखें,
अपना अच्छा होने का उनका भ्रम भी टूटे,
लेकिन कितनी बार बिखरी हूँ मैं
कितना दुखा है दिल मेरा भी,
उस रोज़ इसका ज़िक्र भी ज़रूर लिखूँगी
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

मैं नदी हो जाऊँगी…
न किनारों की इजाज़त मांगूँगी, न पत्थरों से रास्ता।
जहाँ नहीं मिलेगी जगह, ख़ुद बना लूँगी अपना रास्ता।
अपनी मंज़िल की ओर, बस बह निकलूँगी,
उस रोज़ मैं और मेरे शब्द
पहली बार शायद थोड़े ग़ैर-ज़िम्मेदार लगेंगे।
क्योंकि उन्हें पहली बार मैं बेबाक़ लिखूँगी
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

जो प्रेम बचा होगा, लिख दूँगी,
जो मन की पीड़ा है, लिख दूँगी।
कुछ शिकायतें, कुछ अधूरे ख़्वाब,
कुछ अनकही ख़्वाहिशें, सब लिख दूँगी।
तब कुछ भी अपने भीतर बाक़ी नहीं रखूँगी
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

और जब उस आख़िरी कविता का
आख़िरी शब्द लिखकर कलम रखूँगी,
शायद पहली बार गर्व से तब ख़ुद से कहूँगी
जब किसी और की कहानी का किरदार नहीं
अपनी कहानी की नायिका बनूँगी।
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

और फिर मेरी कविता के
आख़िर में लगा वो पूर्णविराम
मेरा अंत नहीं होगा,
वो शुरुआत होगी
मेरे भीतर बरसों से रुकी उस नदी की,
जिसने आख़िरकार अपनी तरह बहना सीख लिया।
बस फिर बेपरवाह बहूँगी…
जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…

उस दिन शायद मेरे लेखन को भी पूर्णता मिलेगी।
फिर बस ख़ामोश रहकर,
ख़ुद को पा लेने का जश्न करूँगी।
क्योंकि जो कुछ बरसों से भीतर था,
सब कह चुकी होऊँगी…
और फिर
उस आख़िरी कविता के बाद
मैं कभी कुछ नहीं लिखूँगी।

Leave a Reply

Discover more from Tulika ki nazar se...zindagi ka safar

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading